वीरप्पन

दुसरे महायुध्ध के बाद तुरंत ही शुरु हुआ तिसरा महायुध्ध भारत में भी चल रहा है । ये तिसरा महायुध्ध बहुमुखी युध्ध है, कहीं सिधे हथियार से कहीं गेरिला युध्ध, कहीं कानून से कहीं खूद नागरिकों को भागीदार बना के । ये युध्ध है दानव समाजी विश्व के धन माफिया और दुनिया के आम नागरिकों के बीच में ।

भारत के अंदर सशस्त्र लडाई चंबल के डाकुओं ने की, पूर्वोत्तर के अलगाववादियों ने की, इस्लामी आतंकी और शीख खालिस्तानावादियों ने की नक्षली और माओवादियों ने भी की और कर रहे हैं । उन सब में विरप्पन एक अलग चीज था । विरप्पन खूद दानव था, दानव समाजीयों ने खडा नही किया था, दानव समाजी जौहरी होते हैं हिरा खोज ही लेते हैं, उसे सहायता बहुत की थी, उसका फायदा बहुत उठाया गया है और आज उस के मरने के बाद भी फायदा ही उठाया जा रहा है । दानवों के लिए वो प्रेरणा था एक ब्रान्ड था तो पूरा फायदा भी उठा ही लेन्गे ।

आखिर कौन था वो विरप्पन !

इस का पूरा नाम कूज मुनिस्वामी वीरप्पन था । दक्षिण भारत का कुख्यात चन्दन तस्कर था । चन्दन की तस्करी के अतिरिक्त वह हाथीदांत की तस्करी, हाथियों के अवैध शिकार, पुलिस तथा वन्य अधिकारियों की हत्या व अपहरण के कई मामलों का भी अभियुक्त था । वीरप्पन का जन्म 18 जनवरी 1952 को गोपीनाथम नामक ग्राम में एक चरवाहा परिवार में हुआ था । 18 वर्ष की उम्र में वह एक अवैध रूप से शिकार करने वाले गिरोह का सदस्य बन गया । अगले कुछ सालों में उसने अपने एक प्रतिद्वंदी गिरोह का खात्मा किया और सम्पूर्ण जंगल का कारोबार उसके हाथों में आ गया । उसने चंदन तथा हाथीदांत से पैसा कमाया ।

कहा जाता है कि उसने टोटल 2000 हाथियों को मार डाला, पर उसकी जीवनी लिखने वाले सुनाद रघुराम के अनुसार उसने 200 से अधिक हाथियों का शिकार नहीं किया होगा ।

उसका 40 लोगों का गिरोह, अपहरण तथा हत्या की वारदात करते रहते थै जिनके शिकार प्रायः पुलिसकर्मी या वन्य अधिकारी होते थे । विरप्पन प्रसिद्ध व्यक्तियों की हत्या तथा अपहरण के बल पर अपनी मांग रखने के लिए भी कुख्यात था । 1987 में उसने एक वन्य अधिकारी की हत्या कर दी । 10 नवंबर 1991 को उसने एक आई एफ एस ऑफिसर पी श्रीनिवास को अपने चंगुल में फंसा कर उसकी निर्मम हत्या कर दी । इसके अतिरिक्त 14 अगस्त 1992 को मीन्यन (कोलेगल तालुक) के पास हरिकृष्ण (आईपीएस) तथा शकील अहमद नामक दो वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों समेत कई पुलिसकर्मियों की हत्या तब कर दी जब वे एक छापा डालने जा रहे थे ।

अपने गांव गोपीनाथम में उसकी छवि रॉबिन हुड की तरह थी । गांव के निवासी उसके लिएएक छत्र की तरह काम करते थे तथा उसे पुलिस की गतिविधियों के बारे में सूचनाएं दिया करते थे । वे उसके गिरोह को भोजन तथा वस्त्र भी मुहैया कराते थे । ऐसा कहा जाता है कि लोग ऐसा वीरप्पन से डरकर करते थे । वीरप्पन ने गांववालों को कभी-कभार पैसे से मदद इसलिए की कि वो उसे पुलिस की गिरफ्त में आने से बचा सकें । उसने उन ग्रामीणों को क्रूरता से मार डाला जो पुलिस को उसके बारे में सूचनाएं दिया करते थे ।

उसे 1986 में एक बार पकड़ा गया था पर वह भाग निकलने में सफल रहा । वन्य जीवन पर पत्रकारिता करने वाले फोटोग्राफर कृपाकर, जिसे उसने एक बार अपहृत किया था, कहते हैं कि उसने अपने भागने के लिए पुलिस को करीब एक लाख रूपयों की रिश्वत दी थी ।

उसने एक चरवाहा परिवार की कन्या, मुत्थुलक्षमी से 1991 में शादी की । वीरप्पन ने सेंट्रल एक्साईज़ कैंटीन में भी काम किया था । वो एक धार्मिक आदमी था तथा प्रतिदिन प्रार्थना करता था । उसने सरकार से कई बार सम्पर्क किया और क्षमादान की मांग की । उसकी ईच्छा थी कि वो एक अनाथाश्रम खोले तथा राजनीति से जुड़े (फूलन देवी से प्रेरित होकर)। वह माँ काली का बहुत भक्त था और कहा जाता है कि उसने एक काली मंदिर भी बनवाया था ।

1990 में कर्नाटक सरकार ने उसे पकड़ने के लिए एक विशेष पुलिस दस्ते का गठन किया । जल्द ही पुलिसवालों ने उसके कई आदमियों को पकड़ लिया । फरवरी, 1992 में पुलिस ने उसके प्रमुख सैन्य सहयोगी गुरुनाथन को पकड़ लिया । इसके कुछ महीनों के बाद वीरप्पन ने चामाराजानगर जिला के कोलेगल तालुक के एक पुलिस थाने पर छापा मारकर कई लोगों की हत्या कर दी और हथियार तथा गोली बारूद लूटकर ले गया । 1993 में पुलिस ने उसकी पत्नी मुत्थुलक्ष्मी को गिरफ्तार कर लिया । अपने नवजात शिशु के रोने तथा चिल्लाने से वो पुलिस की गिरफ्त में ना आ जाए इसके लिए उसने अपनी संतान की गला घोंट कर हत्या कर दी ।

18 अक्टूबर 2004 को उसे मार दिया गया । उसके मरने पर भी कई तरह के विवाद हैं । वीरप्पन की पत्नी का कहना है कि उसे कुछ दिन पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया था । वीरप्पन ने कई बार चेतावनी दी थी कि यदि उसे पुलिस के खिलाफ किसी मामले में फंसाया जाता है तो वो हर एक पुलिसवाले की ईमानदारी पर उंगली उठा सकता है, इस कारण से उसकी हत्या कर दी गई ।

ये गलत कारण था कि पोलिसने अपने साथियों की अगर बेइमानी हो तो उसे छुपाने के लिए विरप्पन को मार दिया था । बेइमान तो राज नेता थे, राज नेताओं की ही नियत नही थी उसे पकडने की, पोलिस के छोटे छोटे दल भेजे जाते थे विरप्पन के हाथ मरने के लिए, और राजनेताओं की बेइमानी कोर्ट या जांचधिकारी जनता तक नही जाने देते । हां अदि अच्छा राज नेता हो तो जरूर उसे फसाने के लिए कैदियों का उपयोग किया जाता है ।

राष्ट्र के लिए काम करनेवालों को निरुत्साह किया जाता है या हटाया जाता है ।

वी गोपाल होसर

होसर वही आईपीएस अधिकारी हैं जिन्हें कुख्यात वीरप्पन गिरोह के साथ मुठभेड़ के लिए जाना जाता है ।

2004 तक केरल, कर्नाटक और तमिल नाडु में वीरप्पन गिरोह का जबर्दस्त आतंक था | उसका साम्राज्य तीनों राज्यों के जंगलों में फैला हुआ था | उसकी अपनी फौज थी जिसे चुनौती देना तीनों राज्य सरकारों के लिए काफी कठिन था ।

आईपीएस होसर ने वीरप्पन से सीधा मोर्चा लिया और उसके कई साथियों को मार गिराया था । उनकी इस कार्रवाई में होसर गंभीर रूप से घायल हो गये थे । उसके बाद कर्नाटक के घर घर में होसर के लिए दुआ की गयी थी । कोई छह महीने तक अस्पताल में इलाज कराने के बाद होसर ठीक हो सके थे ।

विरप्पन से लोहा लेने का इनाम क्या मिला इन को ? बढति करने के बदले होमगार्ड में भेज दिया । आखिर में समय पूरा होने से पहले ही रिटायरमेंट मांग लिया और 31 दिसम्बर से स्वीकार भी हो गया है ।

लेकिन अपनी सेवा के छह महीने पहले रिटायरमेंट ले लेने के पीछे माना जा रहा है कि सरकार ने उनकी अनदेखी की और उन्हें उनके सम्मान के अनुरूप पद नही दिया । हालांकि होसर ने कहा है कि वह निजी कारणों से रिटायरमें ले रहे हैं ।

के.विजय कुमार (सीआरपीएफ के चीफ) । इन के नाम से कोइ फेसबूक पेज भी चला रहा है ।

https://www.facebook.com/pages/Kvijay-Kumar-IPS/214973695245063

२००१-३ में चेन्नई में जब भूमिगत डोन और अपराधी पोलिस की गोली से गीरने लगे तो दानवों के साथी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने उस समय के पुलिस कमिश्नर  विजय कुमार को दोषी ठहराया और उसे मि.एन्काउंटर नाम दिया था । विजय कुमार ने जवाब दिया था “आखिर, हम आभूषण के रूप में बंदूकें नहीं पहनते, हम क्या कह रहे हैं उस बात का मतलब हम जानते हैं ।”

६ महिने के बाद उनको स्पेशियल टास्क फोर्स के हेड बना कर विरप्पन से भिडा दिया । एसटीएफ ने विरप्पन को पकडने के लिए “ओपरेशन कोकून” चलाया । विरप्पन इस ओपरेशन के ट्रेप में फंस गया और मारा गया ।

http://praveen.kumar.in/2004/10/19/how-veerappan-walked-into-the-stfs-trap/

After being on the run from law for nearly three decades, The STF headed by K. Vijay Kumar (ADGP Tamil Nadu), shot Veerappan dead in the dark hours of October 18, 2004 at Papparapatti village in Tamil Nadu’s Dharmapuri district.
विरप्पन तो गया उस के बाद उस के पकडे गये साथियों को लेकर खेल शुरु हो गये । खेल कानून के, खेल मानव अधिकार बादियों के । मानव अधिकारवादी अपनी गेंग का नाम सुन्दर रख देते हैं, “मानव अधिकार” पर काम हमेंशा दानव के लिए करते हैं । आखिर ये लोग गुनहगारों और आतंकियों के साथ ही क्यों खडे रहते हैं !!

इस दौरान विजय कुमार नें वामपंथी उग्रवाद ( माओवादी नक्षलियों) का डट के सामना किया, कई जगह से सफाया भी कर दिया ।

ओक्टोबर २०१२ में उन का सेवा काल खतम होता था, मांग उठी थी कि वो निवृत्त ना हो, उन की सेवा अवधि बढाई जाए लेकिन उनको रिटायर्ड होना पडा ।  भारत के सबसे बड़े अर्धसैनिक बल के प्रमुख के रूप में श्री कुमार की सेवानिवृत्ति विवाद में पड गयी थी । चिदम्बरम और सुशिल कुमार शिन्दे के आग्रह के बावजूद प्रधानमंत्री मंत्री की अध्यक्षता में काम करती एसीसी द्वारा एक साल के लिए उन की सेवा अवधि बढाने का इनकार कर दिया था । कौन सा रहस्य था कि एक अच्छे ओफिसर का और एक साल के लिए उपयोग नही कर सके ?

कानूनी घटनाक्रम या कानून और मानव अधिकारवादियों का खेल ।

16 Feb 2013

नई दिल्ली। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा दया याचिका खारिज किए जाने के बाद चंदन तस्कर वीरप्पन के चार साथियों ने फांसी की सजा को रुकवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। शीर्ष अदालत ने कर्नाटक की बेलगाम जेल में बंद इन चारो दोषियों की याचिका पर यह कहते हुए तत्काल सुनवाई से मना कर दिया कि इसका कोई सुबूत नहीं है कि कल चारों को फांसी दी जाने वाली है।

वीरप्पन के भाई गन्नानाप्रकाश, सिमोन, मीसीकर मदियाह और बिलावेंद्रन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कोलिन गोंजालविस ने शनिवार शाम मुख्य न्यायाधीश अल्तमस कबीर के समक्ष याचिका पेश की। न्यायाधीश ने इस पर तत्काल सुनवाई से मना करते हुए कहा, यह काम तय व्यवस्था और नियमों के तहत ही होगा। गोंजालविस ने कहा,हम उम्मीद करते हैं कि मुवक्किलों को कल फांसी नहीं दी जाएगी। वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा, सोमवार को हम अदालत में फिर याचिका पर सुनवाई की मांग करेंगे।

वीरप्पन के गिरोह के सक्रिय सदस्य रहे गन्नानाप्रकाश, सिमोन, मीसीकर मदियाह और बिलावेंद्रन को कर्नाटक के पल्लार में 1993 में हुए बारूदी सुरंग विस्फोट के मामले में मैसूर की टाडा अदालत ने 2001 में उम्र कैद की सजा सुनाई थी,शीर्ष अदालत ने 2004 में चारों को फांसी देने का आदेश दिया था। 20 साल पहले हुए इस विस्फोट की चपेट में आकर 22 पुलिस वाले शहीद हुए थे। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने गत 13 फरवरी को चारों दोषियों की फांसी माफी की अर्जी खारिज कर दी थी।

17 Feb 2013

सलेम [तमिलनाडु]। मुंबई हमले में शामिल रहे अजमल कसाब और संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु को फांसी के बाद कुख्यात चंदन तस्कर वीरप्पन के चार साथियों को फांसी देने का रास्ता साफ हो गया है। मगर वीरप्पन की विधवा ने चारों की फांसी का विरोध किया है।

पोलिस की रेड में यह पकडी ना जाए इसलिए अपनी ही एक रोती हुई बच्ची का गला दबाकर मारने वाली इस महिला को अब अपने साथियों के लिए प्रेम जाग उठा है । मुथुलक्ष्मी ने कहा, ‘तमिलनाडु पुलिस पहले ही धर्मपुरी में मेरे पति को मार चुकी है। अब उसके चार सहयोगियों को भी फांसी देने की तैयारी है। कृपया ऐसा न करे।’ वह मानवाधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज, तमिलनाडु के महासचिव बालमुरुगन द्वारा इन चारों की दया याचिका खारिज होने की खबरों पर प्रतिक्रिया दे रही थीं।

२०१२ में अदालत ने वीरप्पन की इस विधवा सहित दस अन्य आरोपियों को भी कन्नड़ अभिनेता राजकुमार के अपहरण मामले में बरी कर दिया है । अदलात ने तेरह अन्य आरोपियों को इसी मामले में एक साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है ।  न्यायिक मजिस्ट्रेट कृष्णन ने इस आधार पर मुथुलक्ष्मी को रिहा कर दिया कि अभियोजन उसके और दस अन्य आरोपियों के खिलाफ आरोप साबित नहीं कर सका । अपने आदेश में कहा कि सात महिलाओं समेत तेरह अन्य अरोपियों के खिलाफ आरोप साबित हो गए हैं इसलिए उनमें से प्रत्येक को एक एक साल के कठोर कारावास और डेढ़-डेढ़ सौ रूपये के जुर्माने की सजा सुनाई जाती है । अभियोजन के अनुसार वीरप्पन और उसके साथियों ने 30 जुलाई 2000 को कन्नड़ अभिनेता राजकुमार का फिरौती के लिए इरोड के थोट्टागजनूर स्थित एक फार्म हाउस से अपहरण कर लिया था । बाद में वीरप्पन ने फिरौती में भारी धनराशि हासिल करने के बाद 108 दिन तक बंधक बनाकर रखे गए राजकुमार को 15 नवंबर 2000 को रिहा कर दिया था ।

डेढ़ सौ रूपये का जुर्माना, सुना, देढ सौ रूपये !!!

माओवादियों का वाईट कॉलर चेहरा भाकपा ने केंद्र से मृत्युदंड की सजा को खत्म करने और बीस साल जेल में काट चुके चंदन तस्कर वीरप्पन के चार सहयोगियों को रिहा करने की मांग की है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने चारों की दया याचिकाएं खारिज कर दी हैं और उन्हें कभी भी फांसी दी जा सकती है।

भाकपा के राष्ट्रीय सचिव डी राजा ने रविवार को यहां कहा, ‘केंद्र सरकार को तत्काल मृत्युदंड की सजा खत्म करने के लिए कानून में पर्याप्त बदलाव करना चाहिए। फांसी या मृत्युदंड गंभीर अपराधों को समाप्त करने की दवा नहीं है। ऐसे अपराधियों को आजीवन कारावास की सजा होनी चाहिए।’ राजा ने वीरप्पन के खिलाफ अभियान के दौरान स्पेशल टॉस्क फोर्स के कर्मियों द्वारा पीड़ितों पर कथित अत्याचार के लिए अनुग्रह राशि की मांग के लिए आयोजित बैठक में कहा कि राज्य सरकार को पीड़ितों को पर्याप्त सहायता देनी चाहिए।

18 Feb 2013

वीरप्पन के भाई और साथियों की फांसी पर फिलहाल रोक

मुख्य न्यायाधीश अल्तमस कबीर की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने वीरप्पन के साथियों की ओर से दाखिल वकील समिक नारायण की याचिका पर बुधवार को सुनवाई की मंजूरी देते हुए तब तक फांसी की सजा पर रोक लगा दी है। इससे पहले अभियुक्तों की ओर से पेश वकील कोलिन गोंसाल्विस ने दोषियों को फांसी दिए जाने का विरोध करते हुए कहा कि उनकी दया याचिका निपटाने में अनुचित देरी हुई है। इसलिए फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया जाना चाहिए। कोलिन ने देवेंदर पाल सिंह भुल्लर के मामले का हवाला देते हुए कहा कि उसकी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला सुरक्षित है। उस मामले में दया याचिका निपटाने में हुई देरी ही आधार है। दूसरी ओर से पेश अटार्नी जनरल जीई वाहनवती ने तकनीकी मुद्दा उठाते हुए याचिका पर सुनवाई का विरोध किया। उन्होंने कहा कि मामले पर सुनवाई नहीं हो सकती, क्योंकि याचिका की प्रति न तो केंद्र सरकार को दी गई है और न ही कर्नाटक सरकार को। अपराध की जघन्यता देखी जानी चाहिए। 22 पुलिस वालों की हत्या हुई थी। यह एक परंपरा बन गई है कि लोग दया याचिका खारिज होने के बाद फांसी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चले आते हैं। कोर्ट ने कहा कि उनके पास दो विकल्प हैं। या तो वे इस याचिका को भी पहले से लंबित मामले के साथ संलग्न कर दें, या फिर अलग से सुनवाई करें।

16 Aug 2013

प्रणब मुखर्जी ने 11 दोषियों की फांसी की सजा पर लगाई अंतिम मुहर

नई दिल्ली। दया याचिकाएं रद करके रिकार्ड बना रहे राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने एक बार फिर 11 दया याचिकाओं को खारिज कर उनको मिली फांसी की सजा पर अंतिम मुहर लगा दी है। इसके बाद वह दिवंगत राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा द्वारा रद की गई 16 याचिकाओं से भी आगे निकल गए हैं। अब तक के अपने कार्यकाल में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 17 दया याचिकाओं को रद कर दोषियों की फांसी की सजा पर अंतिम मुहर लगा दी है।

गौरतलब है कि फरवरी और मार्च 2013 के बीच, राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी वीरप्पन के सहयोगी सायमन, गननप्रकाश, मदैया, बिला वंद्रन की दया याचिका को खारिज कर दिया था। इन पर 22 लोगों की हत्या का जुर्म साबित हुआ था, जिसपर सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें फांसी की सजा दी थी।

जनवरी 21, 2014

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि मृत्युदंड पाए अपराधियों की दया याचिका पर अनिश्चितकाल की देरी नहीं की जा सकती और देरी किए जाने की स्थिति में उनकी सजा को कम किया जा सकता है। इसके साथ ही, शीर्ष अदालत ने 15 दोषियों की फांसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील करने का आदेश दिया। इनमें से चार दोषी वीरप्पन के सहयोगी हैं, जिन्हें 22 पुलिसवालों की लैंड माइन ब्लास्ट कर हत्या करने के आरोप में फांसी की सजा सुनाई गई थी।

इन चारों के अलावा इस फैसले का प्रभाव पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के आरोप में फांसी की सजा पाए मुरुगन, अरुवि और संथन की दया याचिकाओं पर भी पड़ सकता है, जो लंबे समय से लंबित हैं।

आज के फैसले का कई मामलों में निहितार्थ हो सकता है, जिनमें पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के मामले में सजा-ए-मौत का इंतजार कर रहे तीन दोषियों की ओर से दायर दयायाचिका शामिल है। उन्होंने अपनी दया याचिका रद्द करने के राष्ट्रपति के कदम को चुनौती दी थी।

अदालत ने फांसी की सजा का इंतजार कर रहे बंदियों समेत किसी भी बंदी को कैदे-तन्हाई में रखने को असंवैधानिक करार देते हुए कहा कि कारागाहों में इसकी इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। खंडपीठ ने यह भी कहा कि दया याचिका रद्द होने के 14 दिनों के अंदर सजा-ए-मौत पर अमल कर लिया जाना चाहिए।

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आप को लगा की कोइ भारत की आम जनता, शरीफ जनता, शांतिप्रिय जनता के लिए काम कर रहा हो ? ये दानवों के प्यादे हैं । मानवों के विरुध्ध जो भी खडा होता है, जो भी बडे गुनाह करना चाहता तो उसका हौसला तुट ना जाये, हिम्मत ना हार जाये इसलिए फांसी जैसी डरावनी सजा को ही हटाना चाहते हैं ।

देर हुई तो फांसी नही ? किसने देर की ? क्यों देर की ? तो देर करनेवालो को भी फांसी पे चडा दो । फांसी के फंदे खूद जजों के गले पर आयेन्गे तभी मालुम पडेगा जनता से खिलवाड करना क्या होता है और राष्ट्रपति को चेलेन्ज करना क्या होता है ।

युनो के धनमाफियाओं ने बहुत ही बडा खेल खेला है । भारत की एक के बाद एक संस्थाओं से भारत के नागरिकों के विश्वास को मिटा देना । संसद पर विश्वास उठ जाए ऐसे काम नेताओं से करवाये गये अब न्यायतंत्र से भरोसा उठ जाये ऐसे काम न्यायधिशों से करवायेन्गे ।

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