रुपया गीरा या जनता का नसीब ?

कोइ मानेगा एक आदमी की पगार इतने डोलर हो सकती है, किलो के हिराब से ? या कोइ बच्चा बिना लूटने के डर से ५ किलो डोलर ले के दुकान से बिस्किट खरीद ने जा सकता है । या दुकानदार का मजदूर सारे आम डोलर का बोजा उठाये बेन्क के गोडाउन में डालने के लिए जाता हो और चोर लूटता नही या पूलिस उस को पूछती नही की ये ब्लेक मनी कहां से !

हकिकत में ये ब्लॅकमनी ही था, भारत में जो व्याख्या है इस तरह नही की टेक्स नही भरा तो ब्लॅकमनी । पेपेर करंसी ही ब्लॅक मनी है उस ऍन्गल से । सन २००० में जिम्बावे ने जमिन सुधारणा का काम हाथ लिया । गोरे जमीनदारों से जमीन ले कर नागरिकों में बांटने के बहाने राज नेता और सैनिकों ने वो जमीन हथिया ली और नफाखोरी कर के नागरिकों को बेचने लगे । जमिन का लेना बेचना व्यवसाय बन गया, खेती करने का इन्टरेस्ट न होते हुए भी लोग जमीन के मालिक बन गये । देश की खेती की हालत बिगड गई साथ में पूरे अर्थ तंत्र पर बुरा प्रभाव पडा । मेहंगाई आसमान छुने लगी, सरकार नोट छापने की मशीन बन गई, मेहगाई से निपटने निपटते, मजदूरी, पगार, चीजों की किमतें आसमान छुने लगे ।

ये बिलकुल सच है की २००८ में होटल मे खाने के बील चुकातेने मे दो किलो डोलर लगते थे । एक डजन केला ५० मिल्यन डोलरमें मिलता था और तीन अंडे के १०० मिलियन लगते थे ।

 

महिलाएं टोकरी भर के नोट ले जाती थी और आधी टोकरी सामान खरीद कर लाती थी । आदमी को कभी गुस्सा आता था तो वो नोटों को डस्ट बिन में भी डाल देता था केले के छीलकों के साथ ।

 

ये सब हालात जिन्बाब्वे के २००२ से २००९ तक के हैं २००८ चरम सिमा थी जब इन्फ्लेशनका रेट एक लाख हो गया था । जनता लखपति से करोड पति, करोड पति से अरबपति और खरब पति भी बनी लेकिन इस का कोइ मतलब नही था । फरवरी २००९ में नई सरकार ने डोलराईजेशन कर दिया । अपना डोलर सस्पेन्ड कर दिया और युएस डोलर अपना लिया साथ में साउथ आफ्रिकी रॅन्ड भी चलता है आज की तारिख में । इस सारे खेल में गोरों की जमीन गई, जो भी लोग कमाये उनकी जीवन भर की कमाई गयी यदी वो कॅश में थे और अपना धन देश के बेन्कों मे रख्खा था, चाहे कोइ भी हो । सब की जीवनभर की कमाई झिरो हो गई । किसने लाभ उठा लिया कहने की जरूरत नही बची है सब समजने लगे हैं । ये खेल आज का नही है । ईस लिन्क को खोल के देखोगे तो पता चलेगा की अच्छे अच्छे देश इस की चपेट में आ गये हैं भारत को छोड कर ।

http://en.wikipedia.org/wiki/Hyperinflation

  अमरिका को भी नही छोडा था । अमरिकन आज खूद डर रहे हैं ।

 

उनका ये डोलर बहुत मजबूत था जैसे भारत का रुपया मजबूत था, उस की बाईन्ग वेल्यु हाई थी, काफी कुछ खरीदा जा सकता था ईस नोट से । लेकिन मेहंगाई की मार से अमरिकी जनता खूद अपनी करंसी का अपमान करने लगी हैं । 

 

भारत की बात करें तो रुपया गीराने का षडयंत्र आजादी के साथ ही शुरु हो गया था लेकिन जनता के पास ज्यादा रुपये थे नही तो क्या गीरते और षडयंत्रकारी भी इतनी राक्षसी वृति के नही रहे होंगे । लाल बहादूर शास्त्री जी के बाद नई सरकार बिलकुल वामपंथियों के चक्कर में आ गई । ग्लोबल बेन्कर माफियाओं के लिए और भारत के गुलाम राजनेताओं के लिए शास्त्री एक कांटे के समान थे । केजीबी ने ताश्कंद में शास्त्रीजी को मार दिया उस का उपकार चुकाने के लिए नई सरकार ने भारत की अर्थ व्यवस्था को वामपंथी मोड दे दिया । इन्दिरा नई थी उसे कुछ मालुम नही था उसे कठपूतली बनाया और गुलामो की चान्डाल चौकडी उसे नियंत्रित करती गई । गुलाम मोरारजी देसाई का बडा हाथ रहा । वो उस समय के चिदम्बरम थे । भारत की जनता के पास सोना न पहुंचे इस लिए सालों तक सोने पर तरह तरह के सरकारी प्रतिबंध लगाये रख्खे और सोने के स्मगलिन्ग के धंधे की एक राह खोल दी । ये नीचे जो व्यक्तिगत इन्कम टेक्स का स्लेब दिया है वो हिसाबनीश ही समज पायेंगे । हमे तो इतना ही समज में आया की वामपंथी राह के बाद ही अचानक टेक्स बढा दिया, ये नफरत थी वामपंथियों की जनता के प्रति कि जनता धनवान नही होनी चाहिए । धन रखने का हक्क सिर्फ उन के मालिक बेन्कर माफियाओं का ही है । जनता क्यों भरे इतना भारी टेक्स ? कह दिया, टेक्स नही भरो तो आप का धन काला धन है । सरकार की नियत ही काली थी तो जनता क्या करे ।

 

उस समय देसी लोग देसी बेंक चलाते थे, सब बॅन्कों का राष्ट्रियकरण कर दिया । आम व्यापारी जनता को ब्याज पर उधार देते थे उन पर नियंत्रण आ गये । केश को कहीं लाना ले जाना गुनाह हो गया । एक हवालदार भी आदमी को पकडने लगा था और वो सिलसिला आज भी जारी है । इमरजन्सी के बाद मोरारजी देसाई की सरकार ने एक हजार की नोट बंद कर के करोडों रुपये जनता से छीन लिए । ग्राम्य विस्तार के बिलकुल बेखबर बुढों की ५-१० हजार की केश मिल्कत लूट ली गयी । जनता टेक्स भी नही भरती थी ऐसे लोग कोइ जुगाड नही कर पाये की इसे हिसाब में कैसे बताना है वो समज नही पाये और वो आधे पोने दाम किसानों या हिसाब किताब रखने वाले व्यापारियों के दलालों को बेचने लगे । बेन्क नोट जमा करते समय सारा ब्योरा मांगती थी तो कुछ लोग ऐसे ही जमा करने के लिए नही गये । कुछ मुर्ख लोग आज भी सरकार को वो ही मोरारजी वाला आईडिया सरकार को बता रहे हैं । बडे नोट बंद करो कालाधन बडे नोट से ही बाहर आयेगा । उन मुर्खों को पता ही नही कथित बडे नोट से एक सप्ताह का खाने का सामान भी नही आता है । और जनता के पास कथित काला धन है तभी मुश्किल से जी रहे हैं वरना सरकार ने जनता को भुख से मारने के सारे प्लान कर लिए हैं । डोलर गीरे या चडे, रुपिया गीरा कर जनता को लूटना तय है । भविष्यमें जिम्बाबे जैसे हालात न हो ऐसे ही कामना कर सकते हैं ।

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