दे ताली !!

आदमी की सेक्स की गरबडी (डिजोर्डर) जीनेटिक बिमारी है, अकस्मात कुदरत भूल कर देती है । आबादी के बढने के साथ सेक्स दिजोर्डरवाले लोगों की भी आबादी बढ रही है लेकिन परसन्टेज भी बढ रहे हैं । कुदरत के कारण ऐसे लोगों की  जीतनी आबादी बढनी चाहिए उस से कई गुनी आबादी दानव कुल की सोसियल एन्जिनियरिन्ग के कारण बढी है । मल्टिनेशनल कंपनियों की दवाई, बच्चों को दिये जानेवाले टीके, कुछ मेसोन डोक्टरों की मिली भगत । ये सब शारिरिक रूप से मानवजात के जीन्स के साथ खिलवाड कर के उसे नपूंसक या बच्चे को पैदा करने की क्षमता में कमी करवा देते हैं । जीनेटिकली मोडिफाईड अनाज, फल, सब्जियों का रोल भी है । बच्चे पैदा हो तो भी वो कमजोर,  मंद बुध्धि के, सेक्स्युअली गरबडवाले पैदा होते हैं । दूसरा, मानसिक रूप से, धन के द्वारा खडे कीये प्यादों द्वारा गे पन को बढावा दिया जा रहा है, लाखों आदमी पोर्न इन्डस्ट्री द्वारा नये अनुभव, नये साहस के साथ जोड कर गे पन को गौरव प्रदान कर रहे हैं । इन लोगों के लिए समाज में एक अलग जाति का निर्माण किया जा रहा है । किसी आदमी का भाई अगर “गे” है तो वो “गे” है उसका भाई नही, अलग जातिका बना देना है । सामाजिक प्रचार से ही नोर्मल आदमी भी “गे” समाज में चला जाता है । अगर दस आदमी “गे” है तो दूसरे दस नोर्मल आदमी भी उस समाज में चले जाते हैं । उन के अप्रकृतिक सेक्स और उनकी शादी को कानूनी बनाना है, सामाजिक मान्यता दिलवानी है, जब वो शादी करेन्गे तो उसमें एक नोर्मल होगा । इस के पिछे कारण भी है, युएन का एजन्डा नंबर २१ । आबादी को रोकने का यह सटिक उपाय भी है, साथ में धर्मों को भी मूल में चोट पहुंचाई जा सकती है । नोर्मल समाज में भी खलबली मचाई जा सकती है और नोर्मल कुटुंब प्रथा को भी तबाह किया जा सकता है । आदमी के पौरुषत्व पर भी चोट मारी जा सकती है जो बहादूरों का उस का अपना अस्तित्व है, उन की बहादूरी को कम की जा सकती है ।

जी हां दो पुरुषों की शादी, दो नारियों की शादी । युरोप और अमरिका में ऐसी शादियां होने लगी है । नोर्मल आदमी भी पैसे की लालच में अपना संगठन बना के उस के लिए प्रचार और कानूनी लडाईयां लड रहे हैं । मिडिया का भी भरपूर सहयोग है । अभी कुछ महीने पहले अमरिका में दो लडकियों की शादी हुई थी और वैदिक रिवाज के साथ करवाई गई थी । उसमें एक लडकी मूल भारतिय थी और दूसरी गोरी थी । उस की शादी जीवन में कौन स्त्री है और किसे पूरुष का रोल निभाना है वो बात वो जाने । मिडिया में उस का बहुत प्रचार करवाया गया था । अमरिका में बसे भारत के बुढे, अमरिका का पेन्शन खा खा कर भारत की भाषा में सोसियल साईट पर बधाईयां देते लेख लिख रहे थे और भारतियों को गुमराह कर रहे थे । दे ताली !! कोमेन्ट्स में एक दूसरे के साथ तालियां बजाते थे ।

मानवेंद्र सिंह एक टॉक शो में अमेरिका की टीवी एंकर ओप्रा विनफ्रे के साथ ।

भारत का एक प्रसिध्ध “गे” गुजरात के राजपिपला के महाराज के वारिस मानवेंद्र सिंह बरसों से इन्टरनेशनल लेवल पर गे पन के प्रचार में कार्यरत है । अपने गांव में “गे” जनता के लिए आश्रम खोला है, उस के उद्घाटन के लिए विदेशी महिला सेलिब्रीटी को बुलाया गया था । देश विदेश के  “गे” सहलानी वहां आते रहते हैं । उस आश्रम में क्या होता होगा वो कल्पना का विषय है ।

समस्या के इलाज के बारे में कभी नही सोचा । गे और लेस्बियन शारिक रूप से नोर्मल होते है मानसिकता ही विरोधी होती है । पूरुष में अगर स्त्री की मानसिकता है तो इसका इलाज डोक्टरों के पास है, ओपरेशन कर के वो नारी बन सकता है । ऐसा ही नारी के साथ भी है वो पुरुष बन सकती है । सेक्स चेन्ज कोइ बडी बात नही है आजकल ।

एक जजमेन्ट आया और मिडिया में गे सेक्स के समाचार और उसे जायज ठहराने वाले लेखों की बहार आ गई । राजकिय प्यादे भी लाईन में खडे हो गये हैं ।

नेचर में नया नहीं हैं समलैंगिक संबंध, जाने क्यों करते हैं जानवरऐसा

http://www.bhaskar.com/article-hf/RAJ-GANG-homosexual-behavior-in-animals-4461148-PHO.html 

जानवरों के क्रिया कलाप और सहज अभिव्यक्ति को सेक्स के साथ जोड दिया । जानवर अगर ऐसा करते भी है तो आदमी और जानवर में फर्क नही है ? बडी मुश्किल से, हजारों साल की मेहनत के बाद धर्म ने आदमी को सज्जन इन्सान बनाया है, वापस जंगल भेजना है ? जी हां, वापस जंगल की और मानवजात को ले जाना है । मानव का मानव होने का गर्व खंडन करना है । सोसियल डार्विनिजम चलाया ही ईसलिए हैं ।

सुप्रिम कोर्ट का फैसला

————भारत में सुप्रीम कोर्ट ने आपसी सहमति से व्यस्कों के बीच समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने के दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को निरस्त कर दिया। मुख्य न्यायाधीश पी सदाशिवम, न्यायमूर्ति जी एस सिंघवी और न्यायमूर्ति इंजन गोगोई की खंडपीठ ने सुरेश कुमार कौशल, एस के तिजारावाला एवं अन्य की विशेष अनुमति याचिकाओं का एक साथ निपटारा करते हुए समलैंगिक संबंधों को गैर कानूनी करार दिया। खंडपीठ की ओर से न्यायमूर्ति संघवी ने कहा कि समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने के हाईकोर्ट के फैसले को निरस्त किया जाता है। खंडपीड ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को हटाने का विचार विधायी फैसला लेने के लिए संसद स्वतंत्र है। ———-

असली फैसला क्या है ? यह “भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को हटाने का विचार विधायी फैसला लेने के लिए संसद स्वतंत्र है ।“

कोर्ट ने समाज को बता दिया कि कोर्ट समाज के साथ है और बाकी संसद पर छोड दिया है । अब संसद में बैठे धर्म विरोधी तत्व बाकी सारा काम कर लेन्गे । ऐसे लोग सामने भी आ गये हैं अलग अलग राजकिय पक्षों से । और मिडिया भी भरपूर प्रचार करेगा और जनता भी सोचेगी कि ये जो करते हैं ठीक ही है । उन सब दानवि तत्वों का विरोध करने से बेहतर है ताली बजाना । दे ताली !!

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  1. Pingback: महिला दिन या महिला रात ? | bharodiya

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