गिनीपिग

आप कभी बिमार पडे और डॉक्टर की केबिन में बैठे हैं तब कोइ ब्ल्यु शर्ट और टाई पहना हुआ आदमी आता है और लाईन तोडते हुए डॉक्टर की केबिन में घुस जाता है । आप को गुस्सा आता है । आप सोचते हो उस दावाई की कंपनी के सेल्समेन ने आप का समय खराब किया । लेकिन आप का गुस्सा बहुत ज्यादा होना चाहिए, थोडे से गुस्से से काम नही बनेगा, क्यों कि उसने आपका समय ही नही आप की सेहत भी खराब की है, जेब की खराबी तो भूल जाओ, वो ते हर जगह होनी है ।

दानव समुदाय की मल्टिनेशनल दवाई कंपनियों के लिए भारत एक टेस्टिन्ग सेन्टर बन गया है, जहां गरीब जनता का अमानविय नैदानिक परिक्षण हेतु एक गीनीपीग की तरह उपयोग किया जा रहा है । आखीर में सुप्रिम कोर्ट ने भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय से कहा है की भारत में 162 वैश्विक नैदानिक परीक्षणों की स्वीकृति देने का औचित्य साबित करो ।

क्यों कि भारत एक उभरता हुआ देश है और ढीलेढाले नियामक प्रोटोकॉल के कारण दुनिया की चिकित्सा प्रणालियों पर हावी होने की अपनी कभी न खत्म होनेवाली दवा कार्टेल की नीति का एक प्राथमिक लक्ष्य भारत भी बन जायेगा । प्रमुख दवा कंपनियां भारत सरकार को मनाने में काफी हद तक सफल हो गई है और जिन क्षेत्रों में स्वाथ्यसेवा का अभाव है उन गरीब समुदायों में ग्रामीण भारतीयों पर परीक्षण किया जा रहा, जिनमें से कई NCEs, ” नई रासायनिक इकाई ” ( New chemical entity ) शामिल है, और भी सभी प्रकार के परीक्षण के लिए मंजूरी पा ली है ।

परिस्थिति इतनी खराब हो चुकी है की मजबूरन मानवतावादी एक्टिविस्टों को आगे आना पडा है और कानून का सहारा लेना पडा है, और सरकारी ओफिसरों के किलाफ शिकायत करनी पडी है । सुप्रिम कोर्ट ने शिकायात को सुना और हाल ही में एक सुनवाई में सरकार से इन परीक्षणों को दी गई मंजूरी के पीछे का विज्ञानिक सबूत प्रदान करने के लिए कहा गया है । स्वास्थ्य मंत्रालय के पास इस आदेश का पालन करने के लिए सिर्फ दो सप्ताह है ।

कंपनियां गरीबों का लाभ उठाते बिना उचित प्रोटोकॉल के ” NCEs के क्लीनिकल परीक्षण आयोजित किये जा रही है । स्वास्थ्य अधिकार मंच की कोर्डिनेटर अमूल्य निधि का कहना है “ भारत में अवैध और अनैतिक दवा परीक्षणों को समाप्त करना जरूरी है ।“

संगठन की वेबसाइट में कहा गया है कि भारत में नैदानिक परीक्षण बडी तेजी के साथ बढ रहे हैं और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए अत्यधिक जोखम कारक बना गया है । क्लिनिकल परीक्षण के दौरान सिर्फ 2010 और 2012 के वर्ष के बीच १५०० नागरिक को अपनी जान देनी पडी है । सरकार अगर बहुत मोटा वित्तिय लाभ पाने का लालच नही छोडेगी, बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों को नही रोकेगी तो और भी हजारों नागरिक उन बदनसीब नागरिकों के पिछे चल देन्गे ।

“केमिस्ट्री वर्ल्ड” में दिन्शा साचन लिखते हैं “NCEs का परीक्षण विवादित हो गया है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में भारत में हुई मौत का आंकडा बहुत उंचा है । स्वास्थ्य मंत्रालय से मिली जानकारी के अनुसार, नैदानिक परीक्षणों में 1,542 लोगों की मृत्यु 2010 और 2012 के बीच हो गई है ।“

Monthly Index of Medical Specialties के एडिटर सी.एम.गुलाटीने अपने देश के आम लोगों की ओर से संवाददाताओं से कहा कि “भारत में NCEs का परीक्षण देश की मदद नहीं करता है, इसके विपरीत, यह केवल बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों को ही मदद करता है । लागत में कटौती और मुआवजे के भुगतान से बचने के लिए भारत में किया जाता है । दूसरे देशों में दरदी की जान जाने पर बडा भारी मुआवजा चुकाना पडता है ।“

The non-profit organization “Low Cost Standard Therapeutics” के चीनु श्रीनिवासन इस बात से सहमत हैं । उन्होंने संवाददाताओं से कहा NCEs के नैदानिक परीक्षण के फेज-२ और फेज-३ की भी अनुमति भारत में मिली हुई है । अपने देश की सामाजिक और राजनीतिक संरचना के साथ अनुकुल नही हैं ।
कई अन्य लोगों की तरह, श्रीनिवासन को भी भारत का मौजूदा नियामक ढांचा गंभीर रूप से कमजोर लगता है । जो नैतिक रूप से दिवालिया बनी हुई दवा कंपनियों को सिस्टम का व्यापक दुरुपयोग करने देने की सुविधा देता है ।

अपने संगठन के अभियान के उद्देश्य के बारे में निधि कहती हैं “हम जानते हैं, चिंतित हैं और लोगों के हितों के लिए प्रतिबद्ध हैं । ध्यान देने योग्य बात है कि, एक बेहतर विनियामक ढांचे के परिणाम से नागरिकों की जान बचती है तो बड़ी बड़ी फार्मा कंपनियों को कितना भी नूकसान उठाना पडे हमें कोइ परवाह नही ।“

डोक्टर की केबिन में घुसकर दवा सेल्समेंन डोक्टर से क्या क्या व्यापारिक परिक्षण करवाता है और उस से दरदी को क्या नूकसान जाता है उस पर भी थोडा बता दिया होता तो अच्छा था, नीधि जी ।

हमे तो अंदाजित नूकसान का पता है । जरूरत ना होने पर भी दवा लिख दी जाती है या जरूरत की दवा के बदले दूसरी दवा लिख दी जाती है

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